सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 22 जुलाई, को दिल्ली में 20 जुलाई को छात्रों के संसद मार्च के दौरान पुलिस की कथित ज़्यादतियों का स्वतः संज्ञान लेने से मना कर दिया। जब एक वकील ने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के दमन का वीडियो प्रमाण प्रस्तुत करना चाहा तो मुख्य न्यायाधीश ने वीडियो देखने से यह मौखिक टिप्पणी करते हुए इंकार किया कि अदालत का समय ख़राब न करें।
द हिंदू के अनुसार मुख्य न्यायाधीश नीत बेंच के सामने मामला उठाते हुए वकील ने कहा कि अदालत छात्र प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई का संज्ञान ले। वकील ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर हज़ारों प्रदर्शनकारी संसद चलो मार्च के लिए इक्कट्ठा हुए थे और सही तरीके से प्रवेश परीक्षाएं करवाने, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग उनकी मांगों में शामिल थी। प्रदर्शन जंतर मंतर पर पहले से चल रहा था और पुलिस ने क्रूर कार्रवाई की है।
मुख्य न्यायाधीश ने वकील को टोका और कहा, “हमारा समय ख़राब ना करें, अपना समय ख़राब न करें।
वकील ने बेंच, जिसमें न्यायाधीश जॉयमलिया बागची और न्यायाधीश वी मोहन भी शामिल थे, को मनाने की कोशिश जारी रखते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन लाखों छात्रों के मुद्दों केंद्रित है। छात्रों की तीन मांगें हैं।
बेंच ने संकेत दिया कि वह और सुनना नहीं चाहते तो वकील ने कहा कि उनके पास वीडियो का कलेक्शन है जिसमें पुलिस निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर हमला कर रही है और वीडियो प्रस्तुत करने करने की इच्छा जताई।
मुख्य न्यायाधीश ने तत्काल सुनवाई के लिए इंकार करते हुए कहा, “हमारी वीडियो में दिलचस्पी नहीं है। हमारे पास वीडियो देखने का समय नहीं है।”
इससे पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सोमवार को प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस द्वारा अत्यधिक बलप्रयोग का आरोप लगाती याचिका पर तत्काल सुनवाई से यह कहते हुए मना किया था कि “अदालत को इसमें न घसीटें। यह कल सुना जाएगा।”
(जनचौक ब्यूरो)